दिल्ली 2024-25 की सर्दियों के दौरान भारत का सबसे प्रदूषित महानगर बनी रही। आज 28 अक्टूबर 2025 को दिल्ली में एक नया साइंटिफिक एक्सपेरिमेंट देखा जाएगा—क्लाउड सीडिंग (Cloud Seeding)। दिवाली के बाद राजधानी की हवा इतनी खराब हो चुकी है कि सांस लेना भी मुश्किल लग रहा है। AQI 305 के ऊपर दर्ज हुआ है और कई इलाकों में ‘बहुत खराब’ से ‘गंभीर’ स्थिति बन गई है। ऐसे समय में दिल्ली सरकार, IIT कानपुर और मौसम विभाग (IMD) पहली बार मिलकर क्लाउड सीडिंग का ट्रायल करने वाले हैं। मौसम ने साथ दिया तो आज दिल्ली के आसमान में दो स्पेशल प्लेन्स सिल्वर आयोडाइड और सोडियम क्लोराइड के कणों का छिड़काव करेंगे।
क्लाउड सीडिंग क्या है और कैसे काम करती है?
क्लाउड सीडिंग एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें बहुत छोटे-छोटे कण—ज्यादातर सिल्वर आयोडाइड या सोडियम क्लोराइड—को विमान या रॉकेट के जरिए बादलों में छोड़ा जाता है। जब ये कण बादलों की नमी से मिलते हैं तो संघनन होता है और कृत्रिम बारिश शुरू हो सकती है। इसका मुख्य मकसद है—अचानक की गई बारिश से हवा में तैर रहे धूल और पॉल्यूटेंट को जमीन पर गिराना, जिससे AQI यानी एयर क्वॉलिटी बेहतर हो जाए।
इस ट्रायल की जरूरत क्यों पड़ी?
दिल्ली दिवाली के बाद दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार हो गई है। सुबह-सुबह AQI 305 रहा, जो सीधे ‘बहुत खराब’ कैटेगरी में आता है। दिल्ली के 38 में से 27 सेंटरों में हवा की क्वॉलिटी “Very Poor” या “Severe” आंकी गई है। खासकर छोटे बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा के मरीजों के लिए यह हवा काफी खतरनाक है। ऐसे हालात में, क्लाउड सीडिंग से कुछ घंटों के लिए ही सही, पर राहत जरूर मिलने की उम्मीद की जा रही है।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) के विश्लेषण के अनुसार, इस अवधि में शहर का औसत PM2.5 स्तर 175 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया, जो सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक है।
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शिकागो विश्वविद्यालय के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट (EPIC) की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली की वायु गुणवत्ता लोगों की औसत आयु को लगभग 11.9 वर्ष तक घटा रही है — यह आंकड़ा विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानकों की तुलना में है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के मुताबिक, आज सुबह 8 बजे दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 306 दर्ज किया गया, जो “बहुत खराब” श्रेणी (Very Poor Category) में आता है।
सुबह 8 बजे तक विभिन्न क्षेत्रों में AQI इस प्रकार दर्ज किया गया —
- आनंद विहार: 321
- आर.के. पुरम: 320
- सिरी फोर्ट: 350
- बावाना: 336
- बुराड़ी क्रॉसिंग: 326
- द्वारका सेक्टर-8: 316
- मुण्डका: 324
- नरेला: 303
- पंजाबी बाग: 323
कौन कर रहा है और कहां होगा ट्रायल?
यह पूरी प्रक्रिया दिल्ली सरकार, IIT कानपुर और IMD के संयुक्त प्रयास से हो रही है। IIT कानपुर की टीम इससे पहले भी यूपी के कुछ इलाकों में सफल क्लाउड सीडिंग कर चुकी है। आज दो स्पेशल प्लेन दिल्ली के नरेला, रोहिणी और यमुना किनारे जैसे इलाकों में उड़ेंगे, जहां बादलों की पहचान कर उनमें ये सीडिंग की जाएगी। फिर IMD बारिश और वायु गुणवत्ता में आए बदलाव का विश्लेषण करेगी। ट्रायल सफल रहा तो नवंबर के पहले हफ्ते से रेगुलर कृत्रिम वर्षा अभियान शुरू हो सकता है।
दुनिया में कहां-कहां हुआ इस्तेमाल?
क्लाउड सीडिंग चीन, अमेरिका और UAE में सफल मानी जा चुकी है। चीन ने तो 2008 बीजिंग ओलंपिक के दौरान बारिश रोकने और करवाने दोनों के लिए इसका इस्तेमाल किया था। UAE यानी दुबई में भी रेगिस्तानी इलाकों में नमी बढ़ाने के लिए यह प्रक्रिया रेग्युलर रन पर है।
क्या है इसकी सीमा, और असली समाधान क्या?
क्लाउड सीडिंग से तात्कालिक राहत मिल सकती है, लेकिन लॉन्ग टर्म सलूशन नहीं है। एक्सपर्ट्स भी कहते हैं कि असली बदलाव लाने के लिए पराली जलाने पर सख्ती, वाहनों के जरिए निकल रहे धुएं को नियंत्रित करना और बड़े पैमाने पर हरियाली बढ़ाना जरूरी है। यही उपाय दिल्ली को सच में जहर से बचा सकते हैं।
निष्कर्ष-
दिल्ली का यह पहल एक साइंटिफिक इनोवेशन है और प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई में साहसिक कदम है। अगर ट्रायल सफल रहा तो लखनऊ, पटना, कानपुर जैसे कई अन्य प्रदूषित शहरों में भी यह मॉडल अपनाया जा सकता है—जिससे लोगों को राहत की सांस मिलेगी.
