वंदे मातरम: साल 2025 भारत के इतिहास में एक खास मौका लेकर आया है। आज हम उस गीत के 150 साल पूरे होने का जश्न मना रहे हैं जिसने हमारे देश को सबसे आगे की लड़ाई में एकजुट किया – “वंदे मातरम।” 1875 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने यह गीत लिखा था। लेकिन यह सिर्फ एक गाना नहीं है, बल्कि भारत की आत्मा, एकता और देश का प्रतीक है। यह वो गीत है जो सबसे खास दिनों में हर भारतीय के दिल में जोश और गर्व से भरा था, और आज भी जब हम इसे सुनते हैं तो सीना साथी हो जाता है।
“वंदे मातरम्” की शुरुआत कैसे हुई
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवंबर 1875 को अक्षय नवमी के दिन “वंदे मातरम्” लिखा था। यह उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ का हिस्सा था और पहली बार बंगदर्शन पत्रिका में छपा था। इस गीत में उन्होंने भारत माता को एक ऐसी देवी के रूप में दर्शाया है जो शक्ति, समृद्धि और करुणा का प्रतीक है। उस वक्त ब्रिटिश हुकूमत ने भारत की संस्कृति और आत्मसम्मान को खत्म करने की कोशिश की थी – ऐसे में “वंदे मातरम” ने लोगों के दिलों में नई जान डाल दी। यह गीत आत्मगौरव और एकता की लहर लेकर आया।
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गीत का मतलब और महत्वपूर्ण
“वंदे मातरम्” केवल एक राष्ट्रगीत नहीं है – यह भारत की आत्मा का गीत है। इसमें माँ और मूर्ति दोनों की प्रति भक्ति झलकती है। इस गीत ने हर भारतीय को यह समझाया कि देश हमारी माँ है और उसकी सेवा सबसे बड़ा धर्म है। इसका कारण यह है कि यह गीत जाति, धर्म और भाषा से ऊपर के विद्रोहियों को एक करता है। स्वतंत्रता के लिए यह सिर्फ गीत नहीं, बल्कि एक नारा बन गया – “वंदे मातरम
वंदे मातरम की आज़ादी की लड़ाई में भूमिका
1896 में कोलकाता में पहली बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में रशियन नाथ टैगोर ने इसे सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया था। इसके बाद “वंदे मातरम” का नारा बन गया। इरेज़र आंदोलन हो या सिद्धांत, हर जगह यह गीत लोगों में जोश भर देता था। “वंदे मातरम्” का नारा उस समय हर गली और मैदान में गूंजता था – यह भारतीयों की एकता और एकता का प्रतीक बन गया।राष्ट्रीय गीत के रूप में व्याख्या
24 जनवरी 1950 को भारत की संविधान सभा ने “वंदे मातरम” को देश का राष्ट्रीय गीत घोषित किया। इसे “जन गण मन” के साथ समान सम्मान दिया गया। अब जब इस गीत के 150 साल पूरे हो रहे हैं, तो भारत सरकार ने 7 नवंबर 2025 से शुरू होकर एक साल तक चलने वाले विशेष कार्यक्रम की घोषणा की है। वर्चुअल में सामूहिक गायन, प्रदर्शनी और युवाओं के लिए “वंदे मातरम” की कहानी को देखने वाले कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
हमारी विरासत और प्रेरणा
“वंदे मातरम्” आज भी हमें याद दिलाएं कि आज़मा सिर्फ ज़मीन नहीं, बल्कि एक जीवंत शक्ति है जो हमारे सम्मान और भक्ति की पहचान है। यह गीत आज भी लाखों लोगों को देश के लिए दान, साहस और सेवा की भावना सिखाता है। जैसे-जैसे इस सालगिरह के उत्सव को आगे बढ़ाएंगे, यह गीत एक बार फिर उस भारतीय एकता और गौरव को जगाएगा जो हमारी छुट्टियों में हमेशा रहेगा।
निष्कर्ष
“वंदे मातरम” सिर्फ एक गाना नहीं – एक भावना है, जो हमें याद दिलाती है कि भारत माता के प्रति हमारा प्रेम और समर्पण ही हमारी असली ताकत है। 150 साल बाद भी यह गीत रंगीन ही जीवंत और प्रेरणादायक है।

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